ट्रंप ने कहा, अमेरिका कई महीनों तक युद्ध लड़ सकता है।

अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव तेज हो गया है। हालिया सैन्य टकराव के बाद दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी भी लगातार तीखी होती जा रही है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर दावा किया कि ईरान को निशाना बनाने के लिए 1,000 मिसाइलें “लॉक्ड एंड लोडेड” स्थिति में तैनात हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ईरान अमेरिका को निशाना बनाने की कोशिश करता है, तो अमेरिकी सेना के पास जवाब देने की पूरी सैन्य क्षमता मौजूद है। यानी दोनों देशों की ओर से लगातार आक्रामक दावे किए जा रहे हैं।

अपने-अपने दावे और बयान दिए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि आखिर शांति स्थापित करने की कोशिशें बार-बार कमजोर क्यों पड़ जाती हैं?

ट्रंप ने यह भी दावा किया कि अमेरिकी सेना के पास कई महीनों तक युद्ध जारी रखने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि यदि आवश्यक आदेश दिया जाता है, तो अमेरिका लंबे समय तक सैन्य अभियान चला सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि यह नया टकराव किस दिशा की ओर इशारा कर रहा है। दुनिया का मौजूदा विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड ऑर्डर) पहले से ही अस्थिर नजर आ रही है।

आइए, इस पूरी खबर का सार समझते हैं।

एक बार फिर युद्ध शुरू हो गया है। अमेरिका ने ईरान पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए हैं। करीब 140 सैन्य ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की गई है। मिसाइल और ड्रोन लॉन्च साइट्स को निशाना बनाकर तबाह किया गया। दक्षिणी ईरान के बुशहर में भी धमाकों की खबर है। अमेरिकी सेना ने इन हमलों की पुष्टि की है। इसके बाद ट्रंप ने यह भी ऐलान कर दिया कि युद्धविराम (सीज़फायर) अब खत्म हो चुका है।

अब बात करते हैं ईरान के जवाब की।

ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। कुवैत, बहरीन और यूएई में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमले किए गए। यानी अमेरिका को सीधे निशाना बनाने के बजाय उसके क्षेत्रीय सैन्य ठिकानों को टारगेट किया गया। इसी बीच ईरान ने अमेरिका पर समझौता तोड़ने का आरोप लगाया है।

ईरान का कहना है कि एकतरफा समझौते का दौर अब खत्म हो चुका है और अगले आदेश तक हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद रहेगा। यह वही रणनीतिक समुद्री मार्ग है, जिसे दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल और व्यापारिक गलियारों में गिना जाता है।

लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह नौबत आई क्यों? बीच में युद्धविराम हुआ था, फिर तनाव दोबारा क्यों बढ़ गया?

दरअसल, हॉर्मुज़ के पास एक जहाज़ पर हमले के बाद हालात फिर बिगड़ गए। अमेरिका का आरोप है कि ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने साइप्रस के झंडे वाले एक कंटेनर जहाज़ पर हमला किया। वहीं ईरान ने इस कार्रवाई को स्वीकार करते हुए कहा कि जहाज़ बिना उसकी अनुमति के निर्धारित मार्ग से गुजर रहा था। इसी घटना के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया।

यानी हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और ईरान एक बार फिर आमने-सामने हैं। विवाद इस बात को लेकर है कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर नियंत्रण किसका होगा। अमेरिका चाहता है कि हॉर्मुज़ खुला रहे, ताकि जहाज़ों की आवाजाही बिना किसी बाधा के जारी रहे और वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित न हो। क्योंकि यदि यह मार्ग बंद होता है, तो तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आ सकता है।

दूसरी ओर, ईरान भी हॉर्मुज़ पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है। वह अमेरिकी दखल खत्म करने की मांग कर रहा है और जरूरत पड़ने पर जहाज़ों को रोकने की चेतावनी भी दे चुका है।

अब चंद्रशेखर जोशी के विश्लेषण से हालात को समझते हैं।

उनके मुताबिक मौजूदा स्थिति में सबसे पहले ईरान उन जहाज़ों को निशाना बना रहा है, जो उसके बताए गए समुद्री मार्ग का पालन नहीं कर रहे हैं। इसके जवाब में अमेरिका ईरान पर हमला करता है। फिर बदले की कार्रवाई में ईरान खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों को निशाना बनाता है।

ताज़ा घटना में साइप्रस के झंडे वाले एमवी गैलेक्सी जहाज़ पर ईरान ने हमला किया। इस जहाज़ पर 11 भारतीय नाविक मौजूद थे। भारत के ओमान स्थित मिशन और ओमान की नौसेना ने मिलकर 10 भारतीय नाविकों को सुरक्षित बचा लिया, लेकिन एक नाविक अब भी लापता है। इससे हालात की गंभीरता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

भारत सरकार ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि वाणिज्यिक जहाज़ों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हो रहे हमले पूरी तरह अस्वीकार्य हैं।

अब अगर इस पूरे विवाद की जड़ की बात करें, तो वह है हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य।

हॉर्मुज़ का एक हिस्सा ओमान की समुद्री सीमा में आता है, जबकि दूसरा हिस्सा ईरान के अधिकार क्षेत्र में है। ईरान चाहता है कि सभी जहाज़ उसी के बताए हुए मार्ग से गुजरें। वह नहीं चाहता कि जहाज़ ओमान की समुद्री सीमा वाले रास्ते का इस्तेमाल करें। यही इस विवाद का सबसे बड़ा कारण है।

इसी मुद्दे को सुलझाने के लिए कूटनीतिक प्रयास लगातार जारी हैं। हाल ही में ओमान और ईरान के बीच महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें ईरान के विदेश मंत्री भी शामिल हुए। ओमान ने एक प्रस्ताव रखा कि हॉर्मुज़ में दो अलग-अलग समुद्री मार्ग बनाए जाएं—एक ईरान की सीमा से होकर और दूसरा ओमान की सीमा से होकर।

यदि इस प्रस्ताव पर सहमति बन जाती है, तो हॉर्मुज़ को लेकर चल रहा विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ईरान इसे स्वीकार करेगा?

ईरान का मानना है कि हॉर्मुज़ उसके लिए सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार है। यदि जहाज़ ओमान वाले रास्ते से भी आने-जाने लगेंगे, तो ईरान का दबाव बनाने का सबसे बड़ा साधन कमजोर पड़ जाएगा। इसलिए यह देखना अहम होगा कि ईरान इस प्रस्ताव पर कितना सहमत होता है।

फिलहाल स्थिति यही है कि यदि ईरान वाणिज्यिक जहाज़ों पर हमला जारी रखता है, तो अमेरिका जवाबी कार्रवाई करेगा। उसके बाद ईरान फिर पलटवार करेगा और यह तनाव लगातार बढ़ता रह सकता है। लेकिन यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं, तो हालात सुधरने की संभावना भी बनी हुई है।

मौजूदा स्थिति में यदि कोई जहाज़ ईरान के बताए गए मार्ग की बजाय ओमान वाले रास्ते से गुजरता है, तो ईरान उसे निशाना बना रहा है। इसके बाद अमेरिका ईरान पर हमला करता है और फिर ईरान जवाबी कार्रवाई में कतर, कुवैत, जॉर्डन, ओमान जैसे खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी हितों और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश करता है।

हालांकि, एक सकारात्मक संकेत भी सामने आया है। पर्दे के पीछे लगातार कूटनीतिक प्रयास जारी हैं। कई देश दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।

अब यह विवाद केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि हॉर्मुज़ को लेकर ईरान और ओमान के बीच भी मतभेद बढ़ गए हैं। हाल ही में ईरान, ओमान और कतर के बीच इस मुद्दे पर बैठक हुई, जिसमें समाधान तलाशने की कोशिश की गई।

यदि हॉर्मुज़ विवाद का समाधान निकल आता है, तो अमेरिका और ईरान के बीच चल रही अंतिम समझौते की बातचीत भी आगे बढ़ सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या ईरान हॉर्मुज़ को लेकर अपने रुख में नरमी दिखाएगा। क्योंकि ईरान नहीं चाहता कि इस रणनीतिक समुद्री मार्ग पर किसी और का प्रभाव हो। जबकि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और भौगोलिक स्थिति के अनुसार ओमान का भी इस क्षेत्र पर वैध अधिकार है। इसके बावजूद ईरान चाहता है कि हॉर्मुज़ पर उसका प्रभाव बना रहे, ताकि जरूरत पड़ने पर वह इसे रणनीतिक दबाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सके।

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